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HINDI SONNETS

Tuesday, 29 May 2012

"गरीब"


सड़क किनारे सोने वाला;

केवल जानवर ही नहीं हो सकता;

कूडे से बीन के खाने वाला;

केवल जानवर ही नहीं हो सकता;

क्या कहूँ उस शख्स को;

लेकिन शायद वो इंसान भी नहीं हो सकता;

अमीर  लोगों की  भाषा में;

उसे इंसान नहीं "गरीब" कहते है;

अरे! कोई पूछो जा कर उन से;

की वो किस तरह रहते है;

जब दो वक़्त की रोटी को उनका बच्चा तरसता है;

मांगने आते है रोटी,लेकिन हर कोई उन पर बरसता है;

अरे! कुत्ते को भी दो वक़्त की रोटी मिल जाती है;

उसे तो आराम से जीने को एक जिंदगी मिल जाती है;

बिन वस्त्र घुमने वाला;

केवल जानवर ही नहीं हो सकता;

सर्दियों में सीमट के सोने वाला;

केवल जानवर ही नहीं हो सकता;

और तो और सच बोलने वाला इंसान नहीं हो सकता;

क्या कहूँ उस शख्स को;

लेकिन पेट पालने के लिए सच्चा तो "गरीब" भी नहीं हो सकता;

 

                           ----------------------------अज्जू निगम

Tuesday, 22 May 2012

गाँधीजी


गाँधीजी की नेक राह पर;
चलना जो तुम सीख गए;
मानो हर चीज़ को;
अपना बनाना सीख गए;
                                 गाँधी जी की तरह अगर;
                                 तुम सत्यवादी बनना सीख गए;
                                 मानो हर झूठ को;
                                 झुठलाना सीख गए;
  गाँधी जी की तरह अगर;
  तुम धैर्यवान बनना सीख गए;
 मानो धैर्य से हर काम;
 करना सीख गए;
                               गांधीजी की राह थी काँटों भरी;
                               अगर तुम उस पर चलना सीख गए;
                               सच मानो;
                               दुनिया का हर सम्मान पाना तुम सीख गए;
                                                  



-------------------------अजय निगम   

Sunday, 20 May 2012

क्यूँ हर चीज़ कम पड़ जाती है


जितनी भी बातें करूँ मैं तुझसे;
सब कम पड़ जाती है;
याद करने को तुझे;
रातें कम पड़ जाती है;
सोचूं जो तुझसे दूर होने की;
मेरी साँसे थम जाती है;
हो जब भी साथ तेरा;
धड़कने बड़ जाती है;
हो जब मेरे हाथों में तेरा हाथ;
क्यूँ तेरी नज़रे झुक जाती है;
तेरे साथ रहने को;
क्यूँ ये दुनिया छोटी पड़ जाती है.
                                      _____________अजय निगम"अज्जू "

Saturday, 19 May 2012

चाहत


चाहो तो -पहाड़ो से ऊँचे हो तुम;
न चाहो तो एक पत्थर भी नहीं;

चाहो तो- कीचड़ मे खिला कमल हो तुम;
न चाहो तो कीचड़ की गंध भी नहीं;

चाहो तो-लाखों में एक हो तुम;
न चाहो तो अस्तित्व भी नहीं;

चाहो तो -एक शोला हो तुम;
न चाहो तो चिंगारी भी नहीं;

चाहो तो-क्या कुछ नहीं हो तुम;
न चाहो तो कुछ भी नहीं;

चाहने की चाह तो रखो दिल में;
फिर देखो;
क्या कुछ नहीं हो तुम;
     
                           ---------अजय निगम