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HINDI SONNETS

Tuesday, 18 March 2014

"वैश्या "





परत दर परत मैं रोज़ ही आधी कर दी जाती हूँ;
रोज़ नए ग्राहक के लिए मैं ताज़ी कर दी जाती हूँ;
तब मेरा बदन बस खिलौना बन कर रह जाता है;
लोगों के हाथ का बस पुतला बन कर रह जाता है;

जब मैं अपने बच्चों की शक्लें जहेन में लाती हूँ;
तब मैं अपने बदन की आहुति देती जाती हूँ ;
जब रोज़ ही मेरे बदन से वस्त्र उतारे जातें हैं;
तब मैं ग्राहक के सामने बेचारी सी हो जाती हूँ;

परत दर परत मैं रोज़ ही खरोंची जाती हूँ;
रोज़ एक ग्राहक की रखेल बन कर रह जाती हूँ;
जब मैं रोज़ ही असेहेनीये पीड़ा से घिर जाती हूँ;
तब मैं अपने बच्चों की शक्लें जेहेन मैं लाती हूँ;

जब मैं संसार की नज़र मैं बहुत ही गिर जाती हूँ;
जब रोज़ ही मैं एक बुरी गाली बन कर रह जाती हूँ;
तब मैं अपने बच्चों की शक्लें जेहेन मैं लाती हूँ;
पेट पालने को वैसे तो मैं एक माँ ही कहलाती हूँ;

लेकिन संसार की भाषा में मैं "वैश्या " ही बन जाती हूँ;
मैं "वैश्या " ही बन जाती हूँ……….

-------अजय निगम







Monday, 20 May 2013

"जिन्दगी"

कभी तो ठन्डे जूस का गिलास है जिन्दगी...
कभी खोलती चाय सी है जिन्दगी......
कभी मक्खन सी चलती....
तो कभी पापड़ सी टूटती है जिन्दगी....
हर पल बदलता स्वाद है जिन्दगी....
कभी केरी की तरह खट्टी...
तो कभी गन्ने सी मीठी है जिन्दगी....
कभी आलू की तरह मामूली....
तो कभी पनीर की तरह खास है जिन्दगी.....
कभी तरबूज की तरह रसीली....
तो कभी अमरुद की तरह रुखी है जिन्दगी....
जिन्दगी मैं उतार चढ़ाव तो कई है.....
लेकिन खुश रहने का नाम है जिन्दगी.......

---------अजय निगम

Sunday, 13 January 2013

" घोटाला भवन "


बड़े बड़े नेता ही जब कर रहे घोटाला;                                                                          

छोटे नेता क्यों रहे पीछे;


सो उनने भी घोटाला कर डाला;


कभी 2G , कभी कोयले को ही पैसा बना डाला;


आम इंसान की जेब तो छोड़ो;


देश के चोरों ने तो-


बच्चों की पढाई को भी निशाना बना डाला;


दाम बड़ा के बैठें है कोने में;


अब ना जाने किसे बदलेंगे सोने में;


अरबों तो छुपा रखे है विदेशों में;


ये तो देश ही बेच रहे विदेशों  में;


नेतओं के लिवास में दुकानदार हैं ये;


थोडा थोडा कर के देश बेचने को तैयार हैं ये;


वाह! क्या किस्मत है हिंदुस्तान की;


बोली लग रही है उसकी शान की;


देशभक्तों पर ही लगा रहे;


देशद्रोह का इल्ज़ाम है;


ये सब जानने के बाद भी


क्यों सब अंजान हैं;


आवाम के हाथ में ही तो;                           


हिंदुस्तान की जान है;


घोटालेबाजों को अब ना टिकने दो;


"घोटाला भवन" को भी आज                                                                                                                           


घोटालेबाजों के साथ बिकने दो;                                                                           


                          ----------------------------- अजय निगम

Sunday, 28 October 2012

सपने


सपने बुलबुलों की तरह;फिरते है यहाँ से वहां;
है कोई मंजिल तय कहाँ;
क्या पता जायेंगे ये कहाँ;
उडने में भी हवाओं का हाथ है;
रुक जाएँ ये भी तो फिर कौन साथ है;
टूट के बिखरेंगे जब;
समेटने को कम होंगे, दोनों तेरे  हाथ है;
गम से तब मुलाकातें होंगी;
अकेलेपन से कुछ बातें होंगी;
तब हवा भी साथ देने ना आएगी ;
सपनो की तेरी यूँ ही बलि चढ़ जाएगी;
इन हवाओं पर तू इतना विशवास ना कर;
संग रहेंगी सदा; इसकी तू आस ना कर;
सपनो को अपने तू बादल बना ले;
बरस-बरस के हर जगह;
अपनी  तू एक पहचान बना ले;
सपने पूरा करने को;
खुद को तू द्रण निश्चयी बना ले;
                                                                        --------------अजय निगम

Thursday, 25 October 2012

“सियासी मेला”


चलो फिर उस मेले में चलते है;
जहाँ रोज़ हाथी,घोड़े जलते है;
चलो फिर उस मेले में चलते है;
जहाँ लाखों नोट रोज़ हाथ बदलते है;
चलो चलकर देख आयें;
"हाथ" की सफाई,"हाथी" का कारनामा;
चलो देखे चलकर;
कैसे कर रहे नेता गरीबों के साथ करारनामा;
इस मेले में बेठने को कुर्सियां कम ही मिल पाती है;
यहाँ सारी कुर्सियां तो आरक्षण से घिर जाती है;
यहाँ जंग जीतने को;
हद पार कर दी जाती है;
यहाँ जंग जीतने को;
इंसानियत मार दी जाती है;
चलो चले इस सियासी मेले में;
जहाँ रोज़ नयी घटनाये घट जाती है;

                               ----------------------अजय निगम