रोज़ नए ग्राहक के लिए मैं ताज़ी कर दी जाती हूँ;
तब मेरा बदन बस खिलौना बन कर रह जाता है;
लोगों के हाथ का बस पुतला बन कर रह जाता है;
जब मैं अपने बच्चों की शक्लें जहेन में लाती हूँ;
तब मैं अपने बदन की आहुति देती जाती हूँ ;
जब रोज़ ही मेरे बदन से वस्त्र उतारे जातें हैं;
तब मैं ग्राहक के सामने बेचारी सी हो जाती हूँ;
परत दर परत मैं रोज़ ही खरोंची जाती हूँ;
रोज़ एक ग्राहक की रखेल बन कर रह जाती हूँ;
जब मैं रोज़ ही असेहेनीये पीड़ा से घिर जाती हूँ;
तब मैं अपने बच्चों की शक्लें जेहेन मैं लाती हूँ;
जब मैं संसार की नज़र मैं बहुत ही गिर जाती हूँ;
जब रोज़ ही मैं एक बुरी गाली बन कर रह जाती हूँ;
तब मैं अपने बच्चों की शक्लें जेहेन मैं लाती हूँ;
पेट पालने को वैसे तो मैं एक माँ ही कहलाती हूँ;
लेकिन संसार की भाषा में मैं "वैश्या " ही बन जाती हूँ;
मैं "वैश्या " ही बन जाती हूँ……….
-------अजय निगम
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