सपने बुलबुलों की तरह;फिरते है यहाँ से वहां;
है कोई मंजिल तय कहाँ;
क्या पता जायेंगे ये कहाँ;
उडने में भी हवाओं का हाथ है;
रुक जाएँ ये भी तो फिर कौन साथ है;
टूट के बिखरेंगे जब;
समेटने को कम होंगे, दोनों तेरे हाथ है;
गम से तब मुलाकातें होंगी;
अकेलेपन
से कुछ बातें होंगी;
तब हवा भी साथ देने ना आएगी ;
सपनो की तेरी यूँ ही बलि चढ़ जाएगी;
इन हवाओं पर तू इतना विशवास ना कर;
संग रहेंगी सदा; इसकी तू आस ना कर;
सपनो को अपने तू बादल बना ले;
बरस-बरस के हर जगह;
अपनी तू एक पहचान बना ले;
सपने पूरा करने को;
खुद को तू द्रण निश्चयी बना ले;