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HINDI SONNETS

Sunday, 28 October 2012

सपने


सपने बुलबुलों की तरह;फिरते है यहाँ से वहां;
है कोई मंजिल तय कहाँ;
क्या पता जायेंगे ये कहाँ;
उडने में भी हवाओं का हाथ है;
रुक जाएँ ये भी तो फिर कौन साथ है;
टूट के बिखरेंगे जब;
समेटने को कम होंगे, दोनों तेरे  हाथ है;
गम से तब मुलाकातें होंगी;
अकेलेपन से कुछ बातें होंगी;
तब हवा भी साथ देने ना आएगी ;
सपनो की तेरी यूँ ही बलि चढ़ जाएगी;
इन हवाओं पर तू इतना विशवास ना कर;
संग रहेंगी सदा; इसकी तू आस ना कर;
सपनो को अपने तू बादल बना ले;
बरस-बरस के हर जगह;
अपनी  तू एक पहचान बना ले;
सपने पूरा करने को;
खुद को तू द्रण निश्चयी बना ले;
                                                                        --------------अजय निगम

Thursday, 25 October 2012

“सियासी मेला”


चलो फिर उस मेले में चलते है;
जहाँ रोज़ हाथी,घोड़े जलते है;
चलो फिर उस मेले में चलते है;
जहाँ लाखों नोट रोज़ हाथ बदलते है;
चलो चलकर देख आयें;
"हाथ" की सफाई,"हाथी" का कारनामा;
चलो देखे चलकर;
कैसे कर रहे नेता गरीबों के साथ करारनामा;
इस मेले में बेठने को कुर्सियां कम ही मिल पाती है;
यहाँ सारी कुर्सियां तो आरक्षण से घिर जाती है;
यहाँ जंग जीतने को;
हद पार कर दी जाती है;
यहाँ जंग जीतने को;
इंसानियत मार दी जाती है;
चलो चले इस सियासी मेले में;
जहाँ रोज़ नयी घटनाये घट जाती है;

                               ----------------------अजय निगम