चलो फिर उस मेले में चलते है;
जहाँ रोज़ हाथी,घोड़े जलते है;
चलो फिर उस मेले में चलते है;
जहाँ लाखों नोट रोज़ हाथ बदलते
है;
चलो चलकर देख आयें;
"हाथ" की सफाई,"हाथी" का कारनामा;
चलो देखे चलकर;
कैसे कर रहे नेता गरीबों के साथ
करारनामा;
इस मेले में बेठने को कुर्सियां
कम ही मिल पाती है;
यहाँ सारी कुर्सियां तो आरक्षण
से घिर जाती है;
यहाँ जंग जीतने को;
हद पार कर दी जाती है;
यहाँ जंग जीतने को;
इंसानियत मार दी जाती है;
चलो चले इस सियासी मेले में;
जहाँ रोज़ नयी घटनाये घट जाती है;
----------------------अजय निगम
No comments:
Post a Comment